श्री हरिभक्तिविलास की विज्ञप्ति से उद्धृत।
अनुशासित मानव जीवन अभ्युदय अर्थात् उन्नति, भाग्योदय, सौभाग्य, श्रीवृद्धि, आनन्द, इष्टलाभ का एकमात्र हेतु है। अनुशासन के अभाव से मानव जीवन अतीव अशिव होता है, यहाँतक कि – अनुशासन हीन एक मानव ही पृथ्वी के पक्षमें भार-स्वरूप होता तो है ही समस्त प्राणियों को उद्वेगदान-कारी भी होता है।
शास्त्रीय भक्तिधर्म सुनीति पूर्ण है, इसमें ही प्राणिमात्र के प्रति अभय प्रदान करने की एकमात्र व्यवस्था है, सर्वादि, सर्वनिरपेक्ष, सर्वहितकर, सर्वजन सुखसेव्य ही भक्तिधर्म है। भगवान् श्रीकृष्ण ही उक्त भक्तिधर्म का नित्य प्रचारक हैं।
निर्निमित्त परोपकार हेतु जिन्होंने स्वीय विभूति, जीवन, एवं सुख को परम करुण विश्वस्रष्टा के चरणों में अर्पण किये हैं, वे ही सत् शब्द वाच्य हैं। उनके सहित संयोग ही सत्सङ्ग है, अनुशासन एवं मङ्गलोपदेशात्मक शास्त्र का ग्रहण सत् शब्द से मुख्यतया होता है, द्वितीयतः शास्त्रोपदेश को जीवातु मानकर जो मानव, स्वीय शास्त्रानुभूत विमल शिक्षा प्रदान के द्वारा हिंसा विद्वेषादि का अपसारण हृदय से करते रहते हैं, उनको भी सत् कहते हैं।
शुद्ध भक्ति ही परमोपादेय वस्तु है, इसमें ही प्राणिमात्र सुखपूर्वक अवस्थान कर सकते हैं। परोत्कर्षासहनी बुद्धिशून्य प्राणिमात्र के प्रति ऐकान्तिकी दयापरायण व्यक्ति ही उक्त उत्तमाभक्ति का अधिकारी होता है। भक्तिरसामृतसिन्धु में १।१।११ में शुद्धाभक्ति का लक्षण लिखित है –
“अन्याभिलाषिताशून्यंज्ञानकर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा।।”
सर्वैश्वर्यमाधुर्यपूर्ण, स्वीय अत्याश्चर्य लीला द्वारा चराचर विश्व का आकर्षणकारी, परमप्रेमास्पद स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के निमित्त अथवा श्रीकृष्ण सम्बन्धि विश्ववस्तुसमूह के प्रति आनुकूल्यमय अनुशीलन ही उत्तमाभक्ति अथवा उत्तमाभक्ति का स्वरूप लक्षण है।
श्री हरिभक्तिविलास की विज्ञप्ति से उद्धृत।
सर्वैश्वर्यमाधुर्यपूर्ण, स्वीय अत्याश्चर्य लीला द्वारा चराचर विश्व का आकर्षणकारी, परमप्रेमास्पद स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के निमित्त अथवा श्रीकृष्ण सम्बन्धि विश्ववस्तुसमूह के प्रति आनुकूल्यमय अनुशीलन ही उत्तमाभक्ति अथवा उत्तमाभक्ति का स्वरूप लक्षण है। जो जिस प्रकार होता है, वह ही उसका स्वरूप होता है।
स्वरूप का परिचायक जो लक्षण – अर्थात् जो लक्षण स्वरूप का परिचय प्रदान करता है, वह ही उसका स्वरूप लक्षण अथवा मुख्य विशेषण है। ‘अनुशीलन’ शब्द ‘शील’ धातु से उत्पन्न हुआ है। क्रिया शब्द के द्वारा जिस प्रकार ‘कृ’ धातु का अर्थ बोध ही होता है, अनुशीलन शब्द के द्वारा भी उस प्रकार ‘शील’ धातु का अर्थमात्र ही उक्त होता है। ‘शील’ धातु का अर्थ शीलन, शील धातु अन् प्रत्यय योगसे उक्त शब्दसे अभ्यास, आलोचना, परिदर्शन, प्रवर्तन अर्थ होते हैं। वह शीलन, प्रवृत्त्यात्मक एवं निवृत्त्यात्मक भेद से द्विविध हैं। शारीर, मानस, वाचिक चेष्टा, एवं प्रीति विषादात्मक प्रसिद्ध मानस भाव है। भाव शब्द का अर्थ – वृत्ति है, मानस-भाव शब्द का अर्थ – मनोवृत्ति है।
