श्री हरिभक्तिविलास की विज्ञप्ति से उद्धृत।
प्रसिद्ध मानसभाव शब्द से स्थायी एवं सञ्चारी भावसमूह का बोध होता है । प्रीति विषादात्मक शब्द का अर्थ – रागात्मक एवं द्वेषात्मक है । वाचिक चेष्टा–कीर्तन, मानस चेष्टा–स्मरण, शारीर चेष्टा–श्रवणादि हैं । निवृत्त्यात्मक चेष्टा से त्यागात्मक चेष्टा का बोध होता है। प्रवृत्त्यात्मक चेष्टा शब्द से–ग्रहणात्मक चेष्टा का बोध होता है ।
आनुकूल्यमय का अर्थ रुचिकर है । अतएव साक्षात् श्रीकृष्ण के निमित्त, अथवा श्रीकृष्ण सम्बन्धि वस्तु के प्रति, अर्थात् परम्परा क्रम से तज्जनित जो कुछ शारीरादि चेष्टा, एवं भाव, यह यदि भजनीय के अरुचिकर न होकर रुचिकर होता है, तब यह परिचर्या, सेवा, वरिवस्या, सद्व्यवहार प्रभृति भक्ति शब्दसे कथित होते हैं । अरुचिकर चेष्टा का अथवा भाव का, किन्तु, निजमनोऽनुकूल आचरण का भक्तित्व सिद्ध नहीं होता है, अर्थात् वह भक्ति नहीं है, वह आत्मम्भरिता है ।
यह भक्ति – सोपाधिकी निरुपाधिकी भेद से द्विविधा है। भक्ति की दो उपाधि हैं, एक अन्याभिलाष, अपर अन्य मिश्रण। उपाधि विशिष्टा भक्ति को सोपाधिकी अथवा गौणी भक्ति कहते हैं, एवं उपाधिशून्या भक्ति को निरुपाधि अथवा मुख्या भक्ति कहते हैं। मूललक्षणस्थ उत्तमा शब्द का अर्थ मुख्या है । अतएव पूर्वोक्त अनुशीलन, अन्याभिलाष शून्य एवं अन्य मिश्रण शून्य होता है तो उसको उत्तमा भक्ति कहेंगे। उक्त भक्ति का यह तटस्थ-लक्षण अथवा गौण विशेषण है ।
अन्याभिलाष शब्द से—भोगवासना एवं मोक्षवासना प्रभृति को जानना होगा। अन्यमिश्रण शब्द से ज्ञानकर्मादि के आचरण का बोध होता है। ज्ञान—जीवब्रह्यैक्य ज्ञान, कर्म—स्मृतिशास्त्रोक्त नित्यनैमित्तिकादि कर्म, शुष्कवैराग्य, साङ्ख्य एवं अष्टाङ्गयोग प्रभृति को जानना होगा । अतएव पूर्वोक्त अनुशीलन यदि मुक्ति कामना रहित होकर केवल श्रवण कीर्तनादिमय होता है तो, उसको उत्तमा भक्ति कहेंगे । यह उत्तमाभक्ति, निर्गुणा, शुद्धा, केवला, मुख्या, अनन्या, अकिञ्चना, एवं स्वरूपसिद्धा नाम से अभिहिता है। मुक्तिसाधक ज्ञानादि का मिश्रण न होनेपर एवं भक्तिभिन्न अन्याभिलाष का सम्पर्क न होनेसे भक्ति का उत्तमत्व अथवा शुद्धत्व सिद्ध होता है।
भोगवासना युक्ता भक्ति का नाम सकामा भक्ति है । मोक्षवासना युक्त भक्ति का नाम निष्कामा भक्ति है। तामस राजस गुण-सम्पन्न होने के कारण सकामा भक्ति का अपर नाम सगुणा भक्ति है ।
श्री हरिभक्तिविलास की विज्ञप्ति से उद्धृत।
भोगवासना युक्ता भक्ति का नाम सकामा भक्ति है । मोक्षवासना युक्त भक्ति का नाम निष्कामा भक्ति है। तामस राजस गुण-सम्पन्न होने के कारण सकामा भक्ति का अपर नाम सगुणा भक्ति है । उस भक्ति के अधिकारी आर्त्त एवं अर्थार्थी व्यक्तिगण हैं एवं स्वर्गादि भोग ही उसका फल है ।
उक्त सकामा भक्ति, सत्त्वगुण युक्त होने से मोक्ष वासनायुक्त होती है । तब उसका नाम निष्कामा होता है । मुमुक्षु व्यक्तिगण इसके अधिकारी हैं । यह मोक्ष वासना युक्त निष्कामा भक्ति प्रायकर ज्ञान, योग एवं कर्म द्वारा मिश्रित होती है । कर्म मिश्रा होने से कर्ममिश्रा, योग मिश्रा होने से योगमिश्रा एवं ज्ञान मिश्रा होने से इसको ज्ञानमिश्रा भक्ति कहते हैं । कर्ममिश्रा भक्ति का फल चित्तशुद्धि है, योगमिश्रा भक्ति का फल परमात्मसाक्षात्कार के अनन्तर क्रममुक्ति है, एवं ज्ञानमिश्रा भक्ति का फल ब्रह्मसाक्षात्कार के पश्चात् सद्योमुक्ति है ।
